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महाराणा सांगा के सम्मान में-चलो आगरा

𝗖𝗛𝗔𝗟𝗢 𝗔𝗚𝗥𝗔 12 अप्रैल 1482 — यही वह दिन था जब भारतभूमि पर स्वाभिमान, शौर्य और बलिदान का प्रतीक जन्मा था — महाराणा सांगा।
एक ऐसा योद्धा, जिसने अपने शरीर पर ८० से अधिक घाव खाए, एक हाथ खोया, एक आंख गवाई — लेकिन कभी अपने हिंदुत्व और राष्ट्रधर्म से पीछे नहीं हटे।

आज 12 अप्रैल को आगरा की धरती पर देशभर का राजपूत समाज इकट्ठा हो रहा है —
महाराणा सांगा के सम्मान में,
और उनके विरुद्ध बोलने वाले गद्दारों के खिलाफ एक स्वर में प्रतिकार करने के लिए।

मैं उन सभी स्वाभिमानी भाइयों-बहनों को सादर साधुवाद देता हूं जो दूर-दूर से चलकर आगरा पहुंच रहे हैं।
किसी कारणवश मैं स्वयं वहां उपस्थित नहीं हो पा रहा,
लेकिन मेरा मन, आत्मा और गर्व वहीं है —
आप सभी के साथ, उसी पावन धरती पर।

मुझे आज भी याद है —
साल 2010 में वही आगरा की धरती
जहां हमने 3 लाख राजपूतों के साथ स्वाभिमान का एक महासागर खड़ा किया था।
आज फिर वही पुकार है,
आज फिर वही जरूरत है।

ये आंदोलन केवल राजपूतों का नहीं होना चाहिए —
क्योंकि महाराणा सांगा ने कभी सिर्फ राजपूतों के लिए नहीं,
बल्कि पूरे सनातन धर्म, पूरे राष्ट्र के लिए युद्ध लड़े।

उनकी तलवार राष्ट्र की अस्मिता के लिए उठी,
और उनका हर युद्ध भारत को एकजुट करने की पुकार था।

आज जब कुछ विकृत मानसिकता वाले लोग संसद में बैठकर महाराणा सांगा जैसे अमर राष्ट्रनायकों के खिलाफ बोलते हैं,
तो यह आंदोलन उस सोच के खिलाफ है —
जो भारत की आत्मा पर प्रहार करना चाहती है।

हर समाज, हर विचार, हर भारतवासी को चाहिए कि वह इस आंदोलन का हिस्सा बने,
क्योंकि जब बात देश की हो,
तो कोई एक समाज नहीं —
पूरा देश खड़ा होना चाहिए।

जय महाराणा सांगा

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